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रविवार, 18 जनवरी 2026

मकर संक्रांति' के पावन पर्व पर एक विशेष साप्ताहिक आध्यात्मिक सभा का आयोजन किया गया

 मकर संक्रांति' के पावन पर्व पर एक विशेष साप्ताहिक आध्यात्मिक सभा का आयोजन किया गया


होशियारपुर/दलजीत अज्नोहा 


दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान, गौतम नगर आश्रम, होशियारपुर में 'मकर संक्रांति' के पावन पर्व पर एक विशेष साप्ताहिक आध्यात्मिक सभा का आयोजन किया गया, जिसमें सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी पूनम भारती जी ने संगत को संबोधित करते हुए इस पर्व के वैज्ञानिक व आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डाला । उन्होंने बताया कि पुराणों और विज्ञान के अनुसार जब सूर्य उत्तरायण की स्थिति में आता है, तो अंधकार कम और प्रकाश की वृद्धि होने लगती है, जो मानव जीवन में प्रगति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है । धार्मिक मान्यता है कि यह समय आत्मिक शुद्धि का है, जहाँ तीर्थ स्नान और दान के माध्यम से मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है, परंतु साध्वी जी ने स्पष्ट किया कि जैसे सूर्य बाहरी जगत का अंधकार मिटाता है, वैसे ही जीवन में एक पूर्ण सतगुरु का आगमन शिष्य के अंतःकरण से अज्ञानता के अंधकार को मिटाकर उसे ब्रह्मज्ञान के दिव्य प्रकाश से आलोकित कर देता है । प्रकृति की प्रत्येक लहर और ऋतु हमें ईश्वर से जुड़ने का संदेश दे रही है, पर इसका वास्तविक लाभ वही उठा सकता है जिसकी आत्मा गुरु के सान्निध्य में जागृत हो चुकी हो । इस अवसर पर साध्वी जी ने सिख इतिहास के स्वर्णिम पन्नों को पलटते हुए 'चालीस मुक्तों' और 'माई भागो' के महान प्रसंग का वर्णन किया । उन्होंने बताया कि कैसे आनंदपुर साहिब की घेराबंदी के दौरान गुरु से विमुख होकर 'बेदावा' लिख देने वाले चालीस सिखों को माई भागो जी ने फटकारा और उन्हें पुनः गुरु की शरण में जाने के लिए प्रेरित किया । माई भागो के नेतृत्व में वे सिख रणभूमि में लड़ते हुए शहीद हुए और दशम पातशाह श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने उनकी अटूट भक्ति को देख कर उस 'बेदावा' को फाड़ दिया और उन्हें 'मुक्ति' का वरदान देकर अपने गले से लगा लिया । माई भागो की यह ललकार हमें सिखाती है कि यदि हम भी माया के वशीभूत होकर अपने लक्ष्य से भटक जाएँ, तो गुरु की शरण और दृढ़ संकल्प ही हमें पुनः सही मार्ग पर ला सकता है । अंत में साध्वी जी ने कहा कि मकर संक्रांति या 'माघी' का यह पर्व हमें इतिहास से सीखने की प्रेरणा देता है कि संत और गुरु तो सदैव क्षमाशील हैं, देरी केवल हमारी ओर से प्रार्थना और समर्पण में होती है, अतः हमें भी उन चालीस मुक्तों की तरह अपने अहंकार को त्यागकर सतगुरु के चरणों में स्वयं को समर्पित कर आत्म-कल्याण का मार्ग चुनना चाहिए ।

मकर संक्रांति' के पावन पर्व पर एक विशेष साप्ताहिक आध्यात्मिक सभा का आयोजन किया गया
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