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बुधवार, 31 दिसंबर 2025

पंडित श्री शिव कुमार गौड़ जी को याद करते हुए

 *युगपुरुष सनातन आचार्य

राजपरोहित पंडित शिव कुमार गौड़ जी*


 


यह नाम मात्र किसी एक व्यक्ति का परिचय नहीं, बल्कि धर्म, विश्वास, परंपरा और सेवा की जीवंत पहचान है। वे अपने समय के ऐसे दुर्लभ महापुरुष थे, जिनके जीवन का प्रत्येक क्षण सनातन संस्कृति की रक्षा, प्रचार और मानव कल्याण के लिए पूर्णतः समर्पित रहा। उनकी ख्याति केवल बरनाला अथवा पंजाब तक सीमित नहीं रही, बल्कि देश-प्रदेश और विदेशों तक श्रद्धा, सम्मान और अटूट विश्वास के साथ विस्तृत हुई। वे केवल एक कर्मकांडी पंडित नहीं थे, अपितु धर्म के ध्वजवाहक, समाज के मार्गदर्शक और संस्कारों के सजग संरक्षक थे।

पंडित शिव कुमार गॉड जी का जन्म 30 सितंबर 1943 को बुढ्ढलाडा नगर में माता पूर्णी देवी की पावन कोख से हुआ। उनके पूज्य पिताजी पंडित ज्वाला प्रसाद जी अपने क्षेत्र के अत्यंत प्रतिष्ठित, सिद्ध एवं आदर्श पंडित के रूप में विख्यात थे। ऐसे दिव्य संस्कारों की छाया में पले-बढ़े पंडित शिव कुमार जी बचपन से ही असाधारण प्रतिभा, तेजस्वी बुद्धि और धर्म के प्रति अद्भुत आकर्षण के धनी रहे। उनके व्यक्तित्व में प्रारंभ से ही नेतृत्व, संयम और सेवा-भाव स्पष्ट रूप से झलकता था।

उन्होंने अपनी शिक्षा खन्ना, फतेहाबाद तथा तीर्थराज काशी (बनारस) के प्रतिष्ठित संस्कृत विद्यालयों से प्राप्त की। वेद, शास्त्र, पुराण और कर्मकांड में उनकी गहरी पकड़, शुद्ध उच्चारण तथा शास्त्रीय मर्यादा के प्रति उनकी अटूट निष्ठा ने उन्हें अल्पायु में ही एक सिद्ध, गंभीर एवं अत्यंत सम्मानित आचार्य के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया।

सन 1962 में अपने पूज्य दादाजी पंडित नंद लाल जी के ब्रह्मलीन होने के पश्चात उन्होंने पंडिताई का दायित्व संभाला। यह दायित्व उनके लिए केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि आजन्म तपस्या, साधना और सेवा का पवित्र व्रत बन गया। इसके उपरांत उन्होंने अपने संपूर्ण जीवन को विराट यज्ञ-अनुष्ठानों, शास्त्रीय कर्मकांडों, धर्मशालाओं के निर्माण तथा भव्य मंदिरों की स्थापना एवं सेवा में समर्पित कर दिया। उन्होंने अपने आचरण से यह सिद्ध किया कि सच्चा धर्म वही है, जो समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचता है।

सन 1964 में उनका विवाह धर्मपरायण, सुशील एवं विवेकशील कुशलिया देवी के साथ संपन्न हुआ। वे पंडित जी के जीवन की सबसे बड़ी शक्ति और सहारा रहीं। उनके साथ से पंडित जी के जीवन में स्थिरता, संतुलन और नई ऊर्जा का संचार हुआ। इसी पावन दांपत्य से दो होनहार पुत्र—पंडित नरेश कुमार गॉड जी एवं पंडित राकेश कुमार गॉड जी—का जन्म हुआ, जिन्होंने अपने पिता की परंपरा, मर्यादा और सेवा-भाव को पूर्ण निष्ठा के साथ आगे बढ़ाया और उनके नाम को सही अर्थों में गौरव प्रदान किया।

पंडित शिव कुमार गॉड जी ने अपने जीवनकाल में असंख्य भव्य मंदिरों का निर्माण एवं जीर्णोद्धार कराया तथा क्षेत्र के लगभग सभी प्रमुख मंदिरों में मूर्ति-प्रतिष्ठा अनुष्ठान पूर्ण शास्त्रीय विधि-विधान से संपन्न करवाए।

विशेष रूप से विलासपुर स्थित श्री दुर्गा मंदिर का भव्य निर्माण, संगत को साथ लेकर आगे बढ़कर करवाना, आज भी पूरे क्षेत्र के लिए धार्मिक एकता और सामूहिक सेवा का अनुपम उदाहरण है।

बरनाला के अत्यंत प्रतिष्ठित गीता भवन मंदिर की नींव रखवाने का गौरव भी उन्हीं को प्राप्त है।

उन्होंने प्राचीन शिव मंदिर (स्टेशन वाला), सुखदेवी मंदिर, बाबा गीटी वाला मंदिर, बंसल परिवार मंदिर (10 नंबर गली, कच्चा कॉलेज रोड), श्री पंचायती मंदिर, श्री बालाजी मंदिर (राम बाग), श्री साक्षी गोपाल मंदिर (वृंदावन), श्री निराले बाबा गौ धाम (भदौड़), आस्था धाम मंदिर (आस्था एन्क्लेव) तथा बांके बिहारी मंदिर (ग्रीन कॉलोनी) सहित अनेक मंदिरों में मूर्ति-प्रतिष्ठा अनुष्ठान अत्यंत विधिवत एवं शास्त्रसम्मत ढंग से करवाए। इतना ही नहीं, इन सभी मंदिरों के लिए मूर्तियाँ वे स्वयं जयपुर (राजस्थान) से अपनी देखरेख में चयन कर लाए—जो उनकी धार्मिक सूझ-बूझ, सौंदर्य-बोध और उत्तरदायित्व का अद्वितीय प्रमाण है।

उन्होंने बरनाला के सबसे प्राचीन माँ जंडा वाला मंदिर का अत्यंत भव्य जीर्णोद्धार अपनी निजी साधनों से तथा समाज को साथ जोड़कर करवाया। यह कार्य उनकी निस्वार्थ सेवा-भावना और नेतृत्व क्षमता का सजीव उदाहरण है। इसी प्रकार सेखा रोड, गली नंबर 4 स्थित बाबा बालक नाथ मंदिर का जीर्णोद्धार भी आज समाज के लिए एक प्रेरणादायक मिसाल बन चुका है।

उनकी दूरदर्शिता और लोककल्याण की भावना का शिखर रूप वृंदावन धाम में निर्मित श्री गिरिराज सेवा सदन (2014) है। यह धर्मशाला आज हजारों श्रद्धालुओं के लिए सुविधा, सेवा और शांति का केंद्र है। उनके द्वारा बोए गए सेवा और संस्कारों के बीज आज विशाल वटवृक्ष का रूप ले चुके हैं, जिनकी छाया में हजारों-लाखों श्रद्धालु लाभान्वित हो रहे हैं।

उनके जीवन की सबसे महान और ऐतिहासिक उपलब्धियों में श्री बद्रीनाथ धाम में लंगर सेवा की शुरुआत प्रमुख है। लगातार 25 वर्षों तक प्रतिवर्ष लंगर सेवा का निर्विघ्न संचालन करना और वहीं एक भव्य धर्मशाला निर्माण का संकल्प लेकर उसे अपनी सरपरस्ती, निजी साधनों और जनसहयोग से साकार करना—यह उनके अडिग संकल्प, प्रभु-भक्ति और सेवा-भावना का अद्वितीय उदाहरण है। यह धर्मशाला विशेष रूप से बरनाला के श्रद्धालुओं के लिए एक अमूल्य धरोहर है।

पंडित शिव कुमार गॉड जी की जीवन भर की सबसे बड़ी पूँजी उनके यजमान थे। बरनाला, संगरूर, सुनाम, मानसा, मौड़, बठिंडा, गोनीयाना, जैतों, पटियाला, मलोट, बिलासपुर, बधनी, मोगा, फ़ाज़िल्का, टोहाना, जाखल, लुधियाना, गोबिंदगढ़, ज़ीरकपुर, चंडीगढ़, पंचकुला, दिल्ली, ग्रेटर नोएडा, फ़रीदाबाद, पानीपत, गंगानगर, जैतसर (राजस्थान) से लेकर बैंगलोर, मुंबई, अहमदाबाद तथा कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड तक फैले उनके यजमान उन्हें केवल पंडित नहीं, बल्कि अपने घर का मुखिया, जीवन का मार्गदर्शक और आत्मीय संरक्षक मानते थे। यही उनका सबसे बड़ा सम्मान और अमर विरासत है।

और फिर 25 दिसंबर 2025 की वह हृदयविदारक प्रातः—

जब उनके आकस्मिक निधन का समाचार प्राप्त हुआ और पूरा बरनाला शोक में डूब गया। ऐसा प्रतीत हुआ मानो प्रत्येक घर ने अपना मुखिया खो दिया हो। उस दिन हज़ारों नम आँखों ने भारी हृदय से उन्हें अंतिम विदाई दी। वह केवल विदाई नहीं थी—वह एक युग, एक परंपरा और एक तपस्वी आत्मा को सादर नमन था।

पंडित शिव कुमार गॉड जी भले ही आज भौतिक रूप से हमारे मध्य उपस्थित न हों, किंतु उनके द्वारा किए गए धर्मकार्य, सेवा, संस्कार और मानवता की सुगंध उन्हें युगों-युगों तक अमर बनाए रखेगी।

ॐ शांति।

ईश्वर उनकी पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें

और हमें उनके आदर्शों पर चलने की शक्ति प्रदान करें।

“पंडित शिव कुमार गॉड जी केवल एक महान आचार्य नहीं थे, वे सनातन संस्कृति की चलती-फिरती पाठशाला थे। उन्होंने जो बोया, वह केवल मंदिर और धर्मशालाएँ नहीं थीं, बल्कि विश्वास, संस्कार और सेवा की ऐसी सुदृढ़ नींव थी, जिस पर आने वाली पीढ़ियाँ गर्व से खड़ी रहेंगी। ऐसे महापुरुष कभी जाते नहीं—वे अपने कर्मों से सदा जीवित रहते हैं।”

पंडित श्री शिव कुमार गौड़ जी को याद करते हुए
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  • Date : दिसंबर 31, 2025
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